अलंकार (Alankar): परिभाषा, प्रकार, भेद और उदाहरण - हिंदी व्याकरण
अलंकार (Alankar) हिंदी व्याकरण का एक अनिवार्य विषय है, जो सभी प्रमुख शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में पूछा जाता है। इस लेख में आप अलंकार की परिभाषा, उसके प्रमुख प्रकार, उदाहरणों और उनके अर्थों को विस्तार से समझेंगे। परीक्षा की बेहतर तैयारी के लिए आप अलंकार PDF भी डाउनलोड कर सकते हैं।
Alankar Ki Paribhasha
अलंकार की परिभाषा और उससे संबंधित प्रश्न लगभग हर सरकारी शिक्षक भर्ती परीक्षा (जैसे- CTET, STET, KVS, NVS) में पूछे जाते हैं। उन अभ्यर्थियों के लिए इन प्रश्नों को हल करना अत्यंत सरल हो जाता है, जो इसका क्रमबद्ध अध्ययन करते हैं। अंग्रेजी में अलंकार को 'Figure of Speech' के रूप में जाना जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में अलंकार से संबंधित 3-4 प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। आइए, इस लेख के माध्यम से अलंकार, इसके भेद और उदाहरणों को सरल भाषा में समझते हैं।
अलंकार की उत्पत्ति
अलंकार शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग संस्कृत के महान विद्वान आचार्य भामह ने किया था। उन्होंने इसे काव्य के सौंदर्यशास्त्र के एक उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया, जिसका मुख्य उद्देश्य भाषा में विशिष्ट सौंदर्य, माधुर्य और प्रभाव उत्पन्न करना है।
अलंकार की परिभाषा
अलंकार का शाब्दिक अर्थ है—'अलंकृत करना' या 'सजाना'। जिस प्रकार आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाते हैं। 'अलंकार शास्त्र' में आचार्य भामह ने इसका विस्तृत वर्णन किया है, इसीलिए उन्हें 'अलंकार संप्रदाय' का प्रवर्तक माना जाता है।
Alankar के भेद
- (1)शब्दालंकार- ये वर्णगत, वाक्यगत या शब्दगत होते हैं; जैसे-अनुप्रास, यमक, श्लेष आदि।
- (2)अर्थालंकार- अर्थालंकार की निर्भरता शब्द पर न होकर शब्द के अर्थ पर आधारित होती है। मुख्यतः उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, दृष्टांत, मानवीकरण आदि मुख्य अर्थालंकार हैं।
- (3)उभयालंकार-जहाँ काव्य में शब्द और अर्थ दोनों से चमत्कार या सौन्दर्य परिलक्षित हो, वहाँ उभयालंकार होता है।
| अलंकार के भेद | ||
| 1 | शब्दालंकार | अनुप्रास अलंकार |
| यमक अलंकार | ||
| श्लेष अलंकार | ||
| 2 | अर्थालंकार | उपमा अलंकार |
| रूपक अलंकार | ||
| उत्प्रेक्षा अलंकार | ||
| अतिशयोक्ति अलंकार | ||
| मानवीकरण अलंकार | ||
| 3 | उभयालंकार | – |
शब्दालंकार, अर्थालंकार और उभयालंकार में अंतर
काव्य की शोभा बढ़ाने वाले इन अलंकारों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: शब्दालंकार, अर्थालंकार और उभयालंकार।
| अलंकार | आधार | उदाहरण |
|---|---|---|
| शब्दालंकार | शब्दों की ध्वनि या संरचना | अनुप्रास, यमक, वीप्सा |
| अर्थालंकार | काव्य का अर्थ या भाव | उपमा, रूपक, अतिशयोक्ति |
| उभयालंकार | शब्द और अर्थ दोनों | (शब्दालंकार + अर्थालंकार का समावेश) |
शब्दालंकार
शब्दालंकार वे अलंकार होते हैं, जो काव्य में शब्दों की विशेष ध्वनि, लय, या पुनरावृत्ति के माध्यम से चमत्कार उत्पन्न करते हैं। यह अलंकार मुख्य रूप से शब्दों के चयन और उनके कलात्मक प्रयोग पर आधारित होते हैं। शब्दालंकार के माध्यम से कविता या गद्य को लयात्मक और आकर्षक बनाया जाता है।
(1)अनुप्रास अलंकार
वर्णों की आवृत्ति से जहाँ चमत्कार उत्पन्न हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। उदाहरण हेतु:
- (अ) मधुर मृदु मंजुल मुख मुसकान।- ‘म’ वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार है।
- (ब) सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।- ‘स’ वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार है।
(2)यमक अलंकार
यमक का अर्थ होता है—'युग्म' या 'जोड़ा'। यमक अलंकार में एक शब्द की दो या अधिक बार आवृत्ति होती है और हर बार उनका अर्थ भिन्न होता है; जैसे- कनक कनक ते सौ गुनी...
- (अ)कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय। वा खाये बौराय नर वा पाये बौराय।।-यहाँ ‘कनक’ शब्द की दो बार आवृत्ति है। ‘कनक’ के दो अर्थ हैं- धतूरा तथा सोना, अतः यहाँ यमक अलंकार है।
- (ब)वह बाँसुरी की धुनि कानि परे, कुल कानि हियो तजि भाजति है।-यहाँ ‘कानि शब्द की दो बार आवृत्ति है। प्रथम ‘कानि’ का अर्थ ‘कान’ तथा दूसरे ‘कानि’ का अर्थ ‘मर्यादा’ है, अतः यमक अलंकार है।
(3)श्लेष अलंकार
श्लेष अलंकार में एक शब्द एक ही बार प्रयुक्त होता है, किंतु संदर्भ के अनुसार उसके एक से अधिक अर्थ निकलते हैं; जैसे- रहिमन पानी राखिये...
- (अ) माया महा ठगिनि हम जानी। तिरगुन फाँस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।- तिरगुन- (i) रज, सत, तम नामक तीन गुण। (ii) रस्सी (अर्थात् तीन धागों की संगत), अतः श्लेष अलंकार है।
- (ब) जो रहीम गति दीप की कुल कपूत गति सोय।बारे उजियारे करे, बढ़े अँधेरो होय।।- ‘दीप’ शब्द के दो अर्थ हैं-दीपक तथा संतान। बारे = छोटा होने पर (संतान के पक्ष में), जलाने पर दीपक के पक्ष में।, बढ़े = बड़ा होने पर, बुझा देने पर, अतः श्लेष अलंकार है।
अर्थालंकार
अर्थालंकार वे अलंकार होते हैं, जो काव्य में शब्दों के अर्थ और भावों के सौंदर्य को बढ़ाते हैं। यह अलंकार मुख्य रूप से भाव, विचार और अर्थ की गहराई उत्पन्न करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। अर्थालंकार से रचना में कल्पना, भावुकता और प्रभावशीलता बढ़ती है, जिससे पाठक या श्रोता के मन में गहरी अनुभूति उत्पन्न होती है।
(1) उपमा अलंकार
उपमा का अर्थ है—'तुलना' या 'समानता'। उपमा अलंकार में उपमेय की तुलना उपमान से गुण, धर्म या क्रिया के आधार पर की जाती है।
- (1) उपमेय-वह शब्द जिसकी उपमा दी जाए।
- (2) उपमान-वह शब्द जिससे उपमा या तुलना की जाए।
- (3) समानतावाचक शब्द-जैसे, ज्यों, सम, सा, सी आदि।
- (4) समान धर्म-वह शब्द जो उपमेय व उपमान की समानता को व्यक्त करने वाले होते हैं।
उदाहरण:
- (i) प्रातः नभ था, बहुत गीला शंख जैसे। यहाँ उपमेय-नभ, उपमान-शंख, समानतावाचक शब्द-जैसे, समान धर्म-गीला| इस पद्यांश में ‘नभ’ की उपमा ‘शंख’ से दी जा रही है। अतः उपमा अलंकार है।
- (ii) मधुकर सरिस संत, गुन ग्राही। यहाँ उपमेय-संत, उपमान-मधुकर, समानतावाचक शब्द-सरिस, समान धर्म-गुन ग्राही| संतों के स्वभाव की उपमा मधुकर से दी गई है। अतः उपमा अलंकार है।
(2) रूपक अलंकार
रूपक अलंकार: इसमें उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप किया जाता है, यानी उपमेय और उपमान में कोई अंतर नहीं दिखाई देता। जैसे- चरण कमल बंदौ हरिराई।
- (i) आए महंत बसंत। यहाँ बसंत पर महंत का आरोप होने से रूपक अलंकार है।
- (ii) बंदौ गुरुपद पदुप परागा। इस पद्यांश में गुरुपद में पदुम (कमल) का आरोप होने से रूपक अलंकार है।
(3)उत्प्रेक्षा अलंकार–
उत्प्रेक्षा अलंकार: यहाँ उपमेय में उपमान की संभावना की जाती है। इसमें 'मानो', 'जानो', 'जनु', 'मनु' आदि वाचक शब्दों का प्रयोग होता है। उदाहरण: सोहत ओढ़े पीत पट श्याम सलोने गात। मनो नीलमणि शैल पर आतप परयो प्रभात॥
(4)अतिशयोक्ति अलंकार-
जब किसी वस्तु या व्यक्ति की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए उसे बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाए, तो वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। उदाहरण: हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग। लंका सारी जल गई, गए निसाचर भाग॥
(5)मानवीकरण अलंकार-
जहाँ कवि काव्य में प्रकृति या निर्जीव वस्तुओं को मानवीय क्रियाओं के साथ चित्रित करे, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है। उदाहरण: बीती विभावरी जाग री, अंबर पनघट में डुबो रही, तारा घट उषा नागरी। यहाँ उषा (प्रातः) का मानवीकरण किया गया है।
Download Alankar Hindi Study Notes PDF
अलंकार (Alankar) से संबंधित विस्तृत अध्ययन नोट्स की PDF का सीधा लिंक नीचे दिया गया है। शिक्षक भर्ती परीक्षा की तैयारी को पुख्ता करने के लिए इन नोट्स को अवश्य डाउनलोड करें।
यहाँ से अलंकार (Alankar) Study Notes PDF डाउनलोड करें
अलंकार : FAQs
'मधुकर सरिस संत, गुन ग्राही' में उपमा अलंकार निहित है।
अनुप्रास अलंकार
रूपक अलंकार
अतिशयोक्ति अलंकार
विभावना अलंकार
रूपक
उत्प्रेक्षा
उपमा
उपमा
विरोधाभास
रूपक अलंकार
श्लेष अलंकार
हिंदी व्याकरण में मुख्य रूप से सात प्रकार के अलंकार अधिक प्रचलित हैं: अनुप्रास, उपमा, यमक, रूपक, श्लेष, अतिशयोक्ति और उत्प्रेक्षा अलंकार।
अनुप्रास अलंकार
'प्रातः नभ था, बहुत गीला शंख जैसे' - यहाँ उपमेय (नभ) की तुलना उपमान (शंख) से की गई है, अतः यह उपमा अलंकार का सटीक उदाहरण है।
अलंकार साहित्यिक और काव्यात्मक रचनाओं के वे महत्वपूर्ण तत्व हैं, जो भाषा को सौंदर्यपूर्ण और प्रभावशाली बनाते हैं।
शब्दालंकार वे हैं जो शब्दों की विशिष्ट पुनरावृत्ति और ध्वनि से सौंदर्य उत्पन्न करते हैं, जैसे: अनुप्रास, यमक, श्लेष आदि।
अर्थालंकार वे अलंकार हैं जहाँ चमत्कार शब्दों पर नहीं, बल्कि उनके अर्थ की गहराई पर निर्भर करता है, जैसे: उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि।
उभयालंकार वे अलंकार होते हैं, जो काव्य में शब्द और अर्थ दोनों के माध्यम से चमत्कार या सौंदर्य को पुष्ट करते हैं।